एक और मंज़िल
आज लगभग दो सप्ताह हो गये इस शहर में आये हुए। बड़े शहर की आपाधापी, सड़कों पर कतारों में चलती गाड़ियाँ और लोगों का हुजूम, जाने किस मंज़िल की तलाश में…टोरोंटॊ…सपनों का शहर…
जिस तरह भारत के मुंबई शहर में लोग सपने पूरे करने आते हैं, कनाडा के इस शहर में भी जाने कितनी दूर दूर से, कितने ही देशों से लोग अपने सपने पूरे करने की चाह लिये आते हैं। उनमें से कई लौट जाते हैं वापस अपने देश और कई बस जाते हैं, हो कर रह जाते हैं इस देश के, इस शहर के। हम भी अब शायद हो कर रह गये हैं इस शहर के।
अपना देश छोड़ते वक्त उतना दुख नहीं होता जितना वहाँ अपने लोगों से मिलने जा कर, वापस आने के वक्त होता है, मगर एक पराया देश भी अपना बन जाता है, कैसे समझ ही नहीं आता। “होम स्वीट होम” अब यही लगने लगता है। बेहद मेहन्त की कमाई से मार्टगेज पर ‘अपना’ घर खरीदने का आनंद, ‘होम ओनर’ कहलाने की खुशी यही देश दे सकती है…
धनाड्य तोंदधारी, बगीचे में अपने कुतों को घुमाते हुये सिर्फ़ सिनेमाओं में ही दिखते हैं। रोज़ सुबह की भीड़ के साथ ‘सबवे’ में सफ़र बिल्कुल मुंबई के लोकल ट्रेन जैसे ही, उसी एक उद्देश्य के साथ, पैसा कमाने और कुछ सपने पूरे करने की चाह में…फ़र्क़ कहाँ है? रोज़ आठ या उससे ज़्यादा घंटों की कड़ी मेहनत, किसी भी वक्त ज़रा सी भूल चूक से या काम की कमी की वजह से नौकरी जाने का भय, और दिन के आखिर में बैंक में पैसे कितने जमा हुये, सारे महीने में दो लोगों की कमाई से कितना बचाया जा सकता है का हिसाब…जब सब कुछ एक जैसा ही है, वही दौड़-धूप, वही उद्देश्य तो हम लौट क्यों नहीं जाते अपने देश? क्यों बन जाता है ये पराया देश ज़्यादा अपना?
हमारे दिल में अपने देश, अपने लोगों के लिये प्यार, अपनी मिट्टी की सोंधी खुश्बू अभी भी उतनी ही ताज़ी होती है। टी.वी. पर ऊल जलूल हिन्दी गाने भी बस इसलिये ‘आन’ छोड़ देना कि हिन्दी सुन पा रहे हैं, अपने बच्चों को हर रविवार हिन्दी सीखने हिन्दी की क्लास में भेजना, भारतीय स्वतंत्रता दिवस के दिन अपने घर के आगे या गाड़ी में अपने देश का झंडा लहरा कर घूमना, किसी ‘माल’ में किसी साड़ी पहने हुए वयस्क महिला को देख कर अपनी मां की याद आ जाना, कब बदला है। इतना सब होते हुये भी, देश से इतना लगाव होते हुये भी, क्यों नहीं लौट जाते हम अपने देश? क्या दिया है इस पराये देश ने हमें कि हम यहाँ रह जाते हैं। क्या तथाकथित ‘चमक’दमक’ ही रोक कर रख लेती है हमें यहाँ?
नहीं…
इस ‘नहीं’ पर ही इस पोस्ट को समाप्त कर रही हूँ। अगली बार ‘नहीं’ के आगे…